Posts

अकेले उतने हैं हम

जितनी संचारों की सुविधा बढी, अकेले उतने हैं हम
केवल साथ दिया करते है अपने ही इक मुट्ठी ​ भर​   गम 
राजमार्ग पर दौड़ रही है उद्वेलित बेतार तरंगें पगडंडी पर अंतर्जाल लगाये बैठा अपने डेरे हाथों में मोबाइल लेकर घूम रहा हर इक यायावर लेकिन फिर भी एकाकीपन रहता है तन मन को घेरे
​घँटी  तो बजती है​ पर आवाज़ न कोई दिल को छूती  मन मरुथल की अंगनाई मे दिखते अपनेपन के बस  भ्रम 
हरकारे के कांधे वाली झोली रिक्त रहा करती है मेघदूत के पंथ इधर से मीलो दूर कही मुड़ जाते पंख पसारे नही कबूतर कोई भी अब नभ में जाकर बोतल के संदेशे लहरों की उंगली को थाम ​ ​  न पाए
दुहराना ​ ​  चाहा ​ ​  अतीत के साधन आज  नई दुनिया में असफल होकर बिखर गए  पर सारे के सारे ​ ही ​  उद्यम 
बडी दूर का संदेशा हो या फिर कोई ​ कही​  निकट का  सुबह ​ उगी   जो आस टूट कर बिखर गई संध्या के ढलते टेक्स्ट फेसबुक ट्विटर फोन ईमेल सभी पर बाढ़ उमड़ती लेकिन कोई एक नही है जिसको हम अपना कह सकते
संचारों के उमड़ रहे  इन  बेतरतीबी  सैलाबों  में सब कुछ बह जाता है, रहती केवल सन्नाटे की सरगम

हार है या जीत मेरी

ज़िन्दगी ने जो दिया वह हार है या जीत मेरी जानता हूँ मैं नही, स्वीकार करता सिर झुकाकर
आकलन आधार है बस दृष्टिकोणों के सिरे का जीत को वे हार समझेंहार को जयश्री बना दें एक ही परिणाम के दो अर्थ जब भी है निकलत ये जरूरी है उन्हें तबहम स्वयं निस्पृह बता दें
सौंपती है ज़िन्दगी वरदान ही तो आजुरी में ये मेरा अधिकार उनको रख सकूं कैसे सजाकर
हार दिखती सामनेही जीत का आधार होती ठोकरों ने ही सिखाया पग संभल रखना डगर में राह की उलझन उगाती  नीड के अंकुर हृदय में और देती है नए  संकल्प  के  पाथेय  कर में

आओ बैठें बात करें

आओ बैठें बात करें
बहुत हो चुकी कविता गज़लें काटी राजनीति की फ़सलें कुछ पल आज चैन से कट लें छेड़ विगत का अम्बर, यादों की मीठी बरसात करें
चक्करघिन्नी बने घूमते कोई अनबुझी प्यास चूमते बीत रहे हैं  दिवस टूटते करें दुपहरी सांझ अलस की, सपनों वाली रात करें
आज फ़ेसबुक पीछे छोड़ें और ट्विटर से निज मुख मोड़ें व्हाट्सएप्प का बन्धन तोड़ें और साथ अपने जीवन को, हम अपनी सौगात करें
आओ बैठें बात करें

एक दीपक  जला कर

दृष्टि अपनी बिछाये प्रतीक्षा रही, एक दीपक  जला कर रखे द्वार पर
दिन के दरवेश ढलती हुई सांझ मैं लौट कर के गली में चले आएंगे
अंश पाथेय के मुँह मसोसे रहे भोर उनकी  न उंगली पकड कर चली और पूरा हुआ एक सपना नहीं कर सकें तय बिछी राह की दूरियां सूर्य का रथ सजे इससे पहले सजे आतुरा नैन में स्वप्न आंजे हुये राह में अग्रसर हो रहे पांव ने दी नहीं किन्तु पल की भी मंजूरियां
एक दीपक जला कर रखा आस का कल नई भोर में होंगे संकल्प नव और यायावरी मन नई राह के साथ उनका निभाने चले आएंगे
भग्न ​ मन्दिर की खंडित पडी मूर्तियां रह गई है उपेक्षित  पुनः शाम को  आस्था की पकड़ डोर चलते हुए हाथ छूते नहीं घंटियों का सिरा  वाटिकाएँ उजड़ कर हुई ठूंठ बस, तितलियाँ औ मधुप दूर ही रह गए  एक युग हो गया पाँव पर मूर्ती के फूल कोई कभी जब था आकर गिरा 
फिर भी विश्वास है एक दिन तो कभी, कोई दीपक जलाकर रखेगा यहां  फिर समय करवटें जब बदल कर चले, भाग्य बिगड़े हुए भी संवर जाएंगे 
तुलसी अंगनाई की सूख कर झर गईं बिन पिये जल, समेटे हुये आरती  एक दीपक जला कर न चौरे रखा, सांझ आई,  थी, मूम्ह मोड़ फ़िर से गई ंंत्र के बोल होंठों से रूठे रहे कोई संकल्प की आंजुरि न भरी और ​…

मौसम की गलियारों में

मौसम की गलियारों में बिखरा अब सूनापन है

धूप जवानी  ​की  सीढ़ी चढ़ हो आवारा घूमे तड़के उठ कर ढली सांझ तक चूनर को लहराये ताप रूप का अपने बरसा, करती दिन आंदोलित मुक्त कंठ से पंचम सुर में अपनी स्तुतियाँ गाये
बादल के टुकड़ों से नभ की बढ़ी हुई अनबन है
पनघट ने कर लिया पलायन कहीं दूसरे गाँव तरुवर दृश्य देखते, लज्जित निज छाहों में सिम ​टे  चौपालो ने दरवेशों को कहा  ​अ वांछित कल ही तले नीम के खड़ी दुपहरी बस एकांत लपेटे
सन्नाटे की मौन स्वरों में गूँज रही रुनझुन हे
 दी उतार रख हरी चूड़ियां, दूब हुई बादामी ​पिछवाड़े की बगिया का पथ भूली सोनचिरैया ​ प्यास लिपस्टिक बनी हुई होठों का साथ न छोड़े  शाख शाख पर निर्जनता ही करती ता ता थैया
 तन पर मन  पर अलसाएपन का  ​आ ​ जकड़ा बंधन है

शब्द ​वे आखिर कहाँ हैं

मुखड़ा बनें गीत का मेरे या फिर किसी गजल का मतला
शब्द  ​वे आखिर कहाँ हैं, ढूँढता संध्या सकारे 
जो हृदय के तलघरों की भावनायें व्यक्त कर दें स्वर जिसे कह ना सका उस बात में संगीत भर दें कण्ठ की अंगनाई से चल आई देहरी परअधर की एक उस अनुभूति को जो सहज ही अभिव्यक्त कर दें
शब्दकोशों के पलटते पृष्ठ दिन कितने बिताए शब्द आखिर हैं कहाँ वे, कोई तो उनका पता दे
 शब्द जो छाए हुये हर एक भ्रम को काट डालें शब्द देकर अर्थ, अर्थों को कोई नूतन दिशा दें दो दिलों के मध्य की गहरी घनेरी घाटियों का सेतु बन कर बिछ गई ये दूरियां सारी मिटा दें
शब्द ​ ​ आखिर हैं कहाँ वे,जो रहे असि धार बन कर औरनजिनकी आन रखने प्राण हर कोई लुटा दे
शब्द जिनको साथ लेकर्र मेघदूतम नभ विचरते  शब्द बन कर रूप, रम्भा- उर्वशी को चित्र करते शब्द वे  शचि के गिरा जिनसे नहुष नीचे धरा पर  शब्द ​  ​ जिनसे मोरध्वज के पुत्र बिन संकोच कट्ते
आज ​ ​ जो भी सामने हैं, अर्थ खो निष्प्राण वे सब शब्द आखिर हैं कहाँ ,इतिहास जिनको कल पुकारे ​

नए अर्थ दे दू शब्दों को

​अनुमति  अगर तुम्हारी हो तो नए अर्थ दे दू शब्दों कोऔर छंद में उन्हें पिरो कर मैं इक नया गीत लिख डालूँ


बदली की पायल से बिखरी हैं सुर बन कर जो सरगम के
उन्हें कहू मैं चिकुर सिंधु मे छितराये अमोल कुछ मोती
दामिनियों की पेंजनियों से हुई परावर्तित किरणें है उन्हें नाम दूं उस चितवन का ढली साँझ जो चितवित होती
नए कोष के पृष्ठ अभी तो सारे के सारे हैं कोरे
परिभाषा की नई नई परिभाषा से उ​नको रंग डालूँ

चढ़ती हुई रात कीबगिया के सुरमाये से झुरमुट से
तोडू फूल और फिर गूंथू कुछ की वेणी कुछ के गजरे
अम्बर में खींचा करती हैं मन्दाकिनिया जो रांगोली
उसको बना बूटियाँ कर दूं रंग हिनाई ज्यादा गहरे
पुरबा के ​अल्हड झोंके सा लहराता​ यह ​​ गात तुम्हारा अनुमति दो तो भित्तिचित्र कर इसको अपने स्वप्न सजा लूँ
उगी धूपजोओससिक्त ​ पाटलपर करती हैहस्ताक्षर उसको दे विस्तार बना दूँ एक भूमिकानईग़ज़ल की खिड़की के शीशों पर खिंचतीहुई इंद्रधनुषी रेखाएं उन्हें बनाऊं भंगिम स्मितियाँ