हम खुद से अनजान हो गये

सुबह पांच से सांझ नौ बजे
तक लंबे दिनमान हो गये
करते रहे समन्वय सबसे 
पर खुद से अनजान हो गये

हुई कब सुबह, इस जीवन की
या इस दिन की याद नही है
किस पल चढ़ी दुपहरी सिर पर
ये भी कुछ अनुमान नही है
बस  इतना है याद, हमारे
नयन खुले तो राह बिछी थी
जिस पर चले दूर हम कितने
या देरी, यह ध्यान नही है

हम पथ की बाधा में जूझे
झंझा का व्याख्यान हो गए

दायित्वों के बोझों वाली
कांवर को कांधो पर रखकर
दिन दोपहरी रात अंधेरी
चलते रहे निरंतर पथ पर
नही अपेक्षाओं से परिचय
हुआ हमारा इस यात्रा में
इंद्रधनुष का सिरा दूसरा 
रहा बुलाता बस रह रह कर

अनुपातो के समीकरण का
अनसुलझा विज्ञान हो गए

अधरों ने जो कुछ दुहराया
उनमे गीत नही था कोई
बना जिसे आराध्य पूजते
रहे , रही वह प्रतिमा सोई
जागी नही सरगमें उंगली
छूकर साजों के तारों की
व्यर्थ शिवालय के प्रांगण में
हमने जाकर तुलसी बोई

कही जा सकी नहीं ग़ज़ल जो
बस उसका उन्वान हो गए

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