शब्द ​वे आखिर कहाँ हैं

मुखड़ा बनें गीत का मेरे या फिर किसी गजल का मतला
शब्द 
​वे आखिर कहाँ हैं, ढूँढता संध्या सकारे 

जो हृदय के तलघरों की भावनायें व्यक्त कर दें
स्वर जिसे कह ना सका उस बात में संगीत भर दें
कण्ठ की अंगनाई से चल आई देहरी परअधर की
एक उस अनुभूति को जो सहज ही अभिव्यक्त कर दें

शब्दकोशों के पलटते पृष्ठ दिन कितने बिताए
शब्द आखिर हैं कहाँ वे, कोई तो उनका पता दे

 शब्द जो छाए हुये हर एक भ्रम को काट डालें
शब्द देकर अर्थ, अर्थों को कोई नूतन दिशा दें
दो दिलों के मध्य की गहरी घनेरी घाटियों का
सेतु बन कर बिछ गई ये दूरियां सारी मिटा दें

शब्द
​ ​
आखिर हैं कहाँ वे,जो रहे असि धार बन कर
औरनजिनकी आन रखने प्राण हर कोई लुटा दे

शब्द जिनको साथ लेकर्र मेघदूतम नभ विचरते 
शब्द बन कर रूप, रम्भा- उर्वशी को चित्र करते
शब्द वे  शचि के गिरा जिनसे नहुष नीचे धरा पर 
शब्द
​  ​
जिनसे मोरध्वज के पुत्र बिन संकोच कट्ते

आज
​ ​
जो भी सामने हैं, अर्थ खो निष्प्राण वे सब
शब्द आखिर हैं कहाँ ,इतिहास जिनको कल पुकारे 

Comments

Udan Tashtari said…
शब्द​ ​आखिर हैं कहाँ वे,जो रहे असि धार बन कर
औरनजिनकी आन रखने प्राण हर कोई लुटा दे


--अद्भुत!!

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