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Showing posts from August, 2017

अकेले उतने हैं हम

जितनी संचारों की सुविधा बढी, अकेले उतने हैं हम
केवल साथ दिया करते है अपने ही इक मुट्ठी ​ भर​   गम 
राजमार्ग पर दौड़ रही है उद्वेलित बेतार तरंगें पगडंडी पर अंतर्जाल लगाये बैठा अपने डेरे हाथों में मोबाइल लेकर घूम रहा हर इक यायावर लेकिन फिर भी एकाकीपन रहता है तन मन को घेरे
​घँटी  तो बजती है​ पर आवाज़ न कोई दिल को छूती  मन मरुथल की अंगनाई मे दिखते अपनेपन के बस  भ्रम 
हरकारे के कांधे वाली झोली रिक्त रहा करती है मेघदूत के पंथ इधर से मीलो दूर कही मुड़ जाते पंख पसारे नही कबूतर कोई भी अब नभ में जाकर बोतल के संदेशे लहरों की उंगली को थाम ​ ​  न पाए
दुहराना ​ ​  चाहा ​ ​  अतीत के साधन आज  नई दुनिया में असफल होकर बिखर गए  पर सारे के सारे ​ ही ​  उद्यम 
बडी दूर का संदेशा हो या फिर कोई ​ कही​  निकट का  सुबह ​ उगी   जो आस टूट कर बिखर गई संध्या के ढलते टेक्स्ट फेसबुक ट्विटर फोन ईमेल सभी पर बाढ़ उमड़ती लेकिन कोई एक नही है जिसको हम अपना कह सकते
संचारों के उमड़ रहे  इन  बेतरतीबी  सैलाबों  में सब कुछ बह जाता है, रहती केवल सन्नाटे की सरगम

हार है या जीत मेरी

ज़िन्दगी ने जो दिया वह हार है या जीत मेरी जानता हूँ मैं नही, स्वीकार करता सिर झुकाकर
आकलन आधार है बस दृष्टिकोणों के सिरे का जीत को वे हार समझेंहार को जयश्री बना दें एक ही परिणाम के दो अर्थ जब भी है निकलत ये जरूरी है उन्हें तबहम स्वयं निस्पृह बता दें
सौंपती है ज़िन्दगी वरदान ही तो आजुरी में ये मेरा अधिकार उनको रख सकूं कैसे सजाकर
हार दिखती सामनेही जीत का आधार होती ठोकरों ने ही सिखाया पग संभल रखना डगर में राह की उलझन उगाती  नीड के अंकुर हृदय में और देती है नए  संकल्प  के  पाथेय  कर में

आओ बैठें बात करें

आओ बैठें बात करें
बहुत हो चुकी कविता गज़लें काटी राजनीति की फ़सलें कुछ पल आज चैन से कट लें छेड़ विगत का अम्बर, यादों की मीठी बरसात करें
चक्करघिन्नी बने घूमते कोई अनबुझी प्यास चूमते बीत रहे हैं  दिवस टूटते करें दुपहरी सांझ अलस की, सपनों वाली रात करें
आज फ़ेसबुक पीछे छोड़ें और ट्विटर से निज मुख मोड़ें व्हाट्सएप्प का बन्धन तोड़ें और साथ अपने जीवन को, हम अपनी सौगात करें
आओ बैठें बात करें