सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का
रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे

राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर
नीड तत्पर हो रहा पाथेय नूतन अब सजाकर
सूर्य फिर करने लगा है उग रहे दिन के पटल पर
निज सही, संदेश देता, पांव रख आगे बढ़ा कर

वर्ष यह नव सामने है एक कोरा पृष्ठ वन कर
क्या इबारत तुम लिखो, अधिकार में केवल तुम्हारे

तुम लिखो मंगलाचरण या मंत्र संध्यावंदनों केy
आस की गाथा अधूरी , बोल या आभिनंदनो के
ये तुम्हे करना सुनिश्चित और तब है शब्द चुनना
सज सकें जो भाल की गरिमा बढ़ते चंदनो से

नयन में क्या आँजना है आज निर्धारित करो तुम
तो सजेंगे कल सहज ही स्वप्न स्वर्णिम हो तुम्हारे

नाम गति है ज़िन्दगी का, सूर्य फिर कहने लगा है
हो गया पाषाण सा निष्प्राण जो भी रुक गया है
पंथ के विस्तार को करते नियंत्रित चल रहे पग
 सत्य यह दिनरात का चलता हुआ रथ लिख गया ह

कल सजाये राह क्या निर्भर तुम्हारे निर्णयों पर
सामने हो शून्य या स्वागत करें खुल राजद्वारे


कंठ से हुआ मुखर

उठा प्रकम्प बीन के जो तार से
मधूर सुरों में सरगमां की धार से
वो एक शब्द ढल संख्य शब्द में
हुआ प्रवाह बांसुरी के द्वार से

वो शब्द एक आद्यब्रह्म जो रहा
कोटि कोटि कंठ से हुआ मुखर

गीत बन के जो कि होंठ पर चढ़ा
बिक्षुब्ध करते मौन से जो है लड़ा
अचल अटल रहा समय प्रवाह में
जो पर्वतों सा एक बिंदु पर खड़ा

वो एक स्वर जो नित्य है अशेष है
वो कोटि कोटि कंठ से हुआ मुखर

निकल के शारदा की कर किताब से
वो गूँजता है कंठ के निनाद से
वो रव में प्राण की जगाता चेतना
हुआ युवा वो भाव के प्रताप से

जो सृष्टि का समूची एक मात्रा स्वर
वो कोटि कोटि कंठ से हुआ मुखर

नव वर्ष 2018

आज प्राची के क्षितिज से हो रहे नव गान गुंजित
है नये इक वर्ष की शुभकामना तुमको समर्पित

भोर आतुर है, करे नूतन दिवस पर चित्रकारी
और कलियों ने तुहिन की बूँद ले छवियाँ पखारी
मलयजे आकर सुनाने को चली है मंगलायन
आरती की तान ने नव आस की बूटी सँवारी

आस्था के रंग फिर से आज होते है समन्वित
है नए इस वर्ष की शुभकामना तुमको समर्पित

आ गया है वर्ष लेकर डायरी के पृष्ठ कोर
शब्द लिखती हो तुम्हारे लेखनी केवल नकोरे
स्वस्ति चिह्नों से भरें रांगोलिया उगते दिवस की
और दुलराएँ गली पूरबाइयों के ही झकोरे

पगतली जो पंथ चूमे वह डगर हो पुष्प संज्जित
है नए इस वर्ष की शुभकामना तुमको समर्पित

शेष न साया रहे बीती हुई कड़वाहटों का
हर निमिष अभिनंदनी हो पास आते आगतों का
स्वप्न की जो पालकी आए, सजे दुल्हन सरीखी
साँझ नित स्वागत करे मुस्कान के अभ्यागतों का

जो नयन में कल्पनाएँ हों सभी इस बार शिल्पित
हैं सभी नव वर्ष की शुभकामना सादर समर्पित 

पीपल की छाह नहीं

आपाधापी में जीवन की कहीं तनिक विश्राम नहीं
इस पथ की अ​विरलताओं में है पीपल की छाह नहीं

मुट्ठी ​ में  उंगली थामे सेहुये अग्रसर पग चल चल कर
उंगली थमा किसी को प​थ का निर्देशन देने तक आये
कभी लोरियों ​की सरगम के झूलों पर पेंगे भर झूले
कभी छटपटात सांझो में रहे अ​केले दिया जलाये

गति ने उन्हें जकड़कर ​रखा रुक न सके थे पांव  कही 
इस पथ की अविरालताओं में, कही तनिक विश्राम नही


​स्थिति जनित विवशताओं के परिवेशों में उलझा मानस
रहा ढूंढता समीकरण के हुए तिरोहित अनुपातों को
बो​ई सदा रात की क्यारी में  मृदु आशाओ की कोंपल
और बुहारा किया दुपहरी में बिखरे टूटे ​पातों को 

सपने जिसे सजा रक्खे थे, रहा दूर ही गाँव कहीं 
और राह में दिखी कहीं भी इक पीपल की छाँह नहीं 

कोई साथी नहीं न कोई साया, नहीं काफिला कोई
बीत गए युग वृत्ताकार पथों की दूरी को तय करते
मृग मरीचिका से आशा के लटके रहे क्षितिज पर बादल
संभव नहीं हुआ पल को भी छत्र शीश पर कर कर झरते

दूर दूर तक नीड़ न कोई, जिसको घेरे घाम नहीं
और एक विश्रान्ति सजाने को पीपल की छाँह नहीं

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच
की यह सोच का अंतर
तुम्हें मुड़ने नहीं देता
मुझे झुकने नहीं देता

कटे तुम आगतों से
औ विगत से
आज में जीते
वही आदर्श ओढ़े
मूल्य जिनके
आज हैं रीते

विकल्पों की सुलभता को
तुम्हारा दम्भ आड़े आ
कभी चुनने नहीं देता

उठाकर मान्यताओं
की धरोहर
चल रहा हूँ मैं
मिले प्रतिमान विरसे में
उन्हें साँचा  बनाकर
ढल रहा हूँ में

वसीयत में मिला
अनुबंध अगली पीढ़ियों का
राह में रुकने नहीं देता

तुम्हारा  मानना
परिपाटियां
अब हो चुकी खँडहर
मेरी श्रद्धाएँ
संचित डगमगाई
है नहीं पल पर

मेरा विश्ववास दीपित
आस्थाओं की बंधी गठरी
कभी खुलने नहीं देता 

हम तुम गए मिल

हम तुम गए मिल

हो गये सुधि के वनों में आज फ़िर जीवन्त वे पल
जब भटकती शाम के इक मोड़ पर हम तुम गये मिल

गोख पर धूमिल क्षितिज की रात आकर झुक रही थी
रोशनी जिस पल प्रतीची की गली में मुड़ रही थी
वर्तिका तत्पर हुईं थीं ज्योति के संग नृत्य करने
और मौसम की थिरक में कुछ खुनक सी घुल रही थी

ज़िन्दगी की इस शिला के लेख बन अविरल अमिट वे
आज फिर अंगनाईयों में फूल बन कर हैं रहे खिल

उस घड़ी ऐसा लगा झंकृत हुई सारी  दिशाएं
वृक्ष की शाखाओं पर नूपुर बजे पुरबाइयों के
सांझ की छिटकी हुई सिंदूरिया परछाइयों में
राग अपने आप गूंजे सैकड़ो शहनाइयों के

ज़िन्दगी की , यूं लगा यायावरी पगडंडियों पर
सामने आ मुस्कुराती पास खुद ही आज मंज़िल

चांदनी तन से छिटक कर लग पड़ी नभ में बिखरने
मलयजी इक गंध उड़ती सांस में भरने लगी थी 
दूधिया चन्दाकिरण भुजपाश में ले गात मेरा
जलतरंगी रागिनी से बात कुछ करने लगी थी

पाँखुरी से कुछ गुलाबो की फसल मंदाकिनी से
धार से अपनी सजाई  प्रीत से भरपूर महफ़िल 

भावना छूने लगी नभ, काँचनजंघा शिखर बन
नयन में नन्दनवानों के राजमहली चित्र उभरे
 बिछ गई कचनार की कलिया  स्वयं आ पगतली में
पारिजाती हो गगन पर कल्पना के स्वप्न संवरे 

समीकरणों की सभी उलझन सहज में ही सुलझ ली
आप ही हल हो गई  आकर रुकी जो पास मुश्किल  

पा गई वरदान कोई सहस्र जन्मों की तपस्या
मिल गया आराध्य जैसे बिन किसी आराधना के
स्वाति के मेघा बरसने लग गये मन चातकी पर
शिल्प में ढलने लगे सब कचित्र आकर कल्पना के

मन निरंतर एक  उस ही ज्वार के आरोह पर है
जब था उमड़ा उन पलो में प्रीत का इक सिंधु फेनिल
राकेश खंडेलवाल
21 नवंबर 2017 

कहनी थी कुछ बात नई

तुम ने भी दुहराई कहनी थी कुछ बात नई 
"अच्छे दिन की आआस लगाए बीते बरस कई"

दिन तो दिन है कब होता है अच्छा और बुरा
कोई कसौटी नही बताये खोटा और खरा
दोष नजर का होता, होते दिन और रात वही
 
अपनी एक असहमति का बस करते विज्ञापन
अनुशासन बिन रामराज्य क्या, क्या तुगलक शासन
मक्खन मिलता तभी दही जब मथती रहै रई 

भोर रेशमी, सांझ मखमली, दोपहरी स्वर्णिम
फागुन में बासंती चूनर सावन में रिमझिम
जितने सुंदर पहले थे दिन अब भी रहै वही 

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...