ज़िन्दगी जिन उंगलियों को थाम कर

ज़िन्दगी जिन उंगलियों को थाम कर के मुस्कुराई
स्पर्श जिनका बो गया सपने हजारों ला नयन  में
आस्था के दीप में लौ को जगाया तीलियाँ बन
साथ रह देती दिशायें चेतना में औ शयन में
आज ढलती सांझ ने मुड़ कर मुझे देखा तनिक तो
दृष्टि   के वातायनों में याद बन वे आ गईं हैं
 
अहम अपना खोलने देता नहीं पन्ने विगत के
दंभ की शहनाईयों में फ़ूँक भरता है निशा दिन
कटघरे में आप ही बन्दी बनाकर के स्वयं को
सोचता उसके इशारों पर चले हैं प्रहर और छिन
एक ठोकर पर दिवस की सीढियों पर से फ़िसल कर
ताश के महलों सरीखे स्वप्न दिन के ढा गई है
 
पांव तो आधार बिन थे दृष्टि   रख दी थी गगन पर
है धरा किस ओर देखा ही नहीं झुक कर जरा भी
नींव सुदृढ़ कर सकें विश्वास की सारी शिलायें
खंडहर, सन्देह की परछाई से घिर कर हुईं थी
था नहीं कोई सिरे उत्थान के जो थाम लेता
ज़िन्दगी केवल त्रिशंकु की दशायें पा गई है
 
पंथ पर तो मोड़ सारे रह गये होकर तिलिस्मी
थे सभी भ्रामक चयन जो पांव ने पथ के किये थे
है जहां से लौट कर पीछे चले जाना असंभव
मान कर वृत्तांत जिनको चुन लिया वे हाशिये थे
कर रही थी तर्क लेकर बोझ इक अपराध का जो
भावना करते समर्पण सामने फिर आ गई  है
 
अब उतरती रात लाई थाल में दीपक सजा कर
दृष्टि के कालीन पथ में पाहुनों के, बिछ गये हैं
मानने को है नहीं तैय्यर मन पागल हठीला
वे सुनहरे पल हजारों मील पीछे रह गये हैं
भावना की उधड़नों में थेगली रह रह लगाती
आस की कोयल नया इक गीत आकर गा गई है

2 comments:

Shardula said...

बेहद खूबसूरत और ज़रुरी कविता !

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर कविता..

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